भारत के राष्ट्रपति भारत के औपचारिक प्रमुख और भारतीय सशस्त्र बलों के प्रधान सेनापति होते हैं। राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से भारत के संसद (दोनों सदनों- राज्य सभा एवं लोकसभा) और भारत के प्रत्येक राज्य और क्षेत्र की विधानसभाओं के निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है, जो स्वयं सीधे निर्वाचित होते हैं।
स्वतंत्रा के पश्चात, भारत के गवर्नर जनरल को राष्ट्र प्रमुख घोषित कर दिया गया था। परंतु यह केवल एक अस्थायी मार्ग था। साथ की राजा के अस्तित्व को जारी रखना सही रास्ता नहीं लग रहा था। भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में भारत की संविधान सभा ने देश के लिए एक पूर्णत: नए संविधान के प्रारूपण की प्रक्रिया शुरू की। संविधान 26 नवंबर, 1949 तक तैयार हो चुका था और 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत एक गणतंत्र देश बन गया। 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को आवाज दी थी, इसीलिए इस तिथि को चुना गया था। संविधान के लागू होते ही राजा और गवर्नर जनरल का पद स्वतः ही राष्ट्रपति पद द्वारा प्रतिस्थापित हो गया।
योग्यता
राष्ट्रपति पद के पात्र होने के लिए संविधान के अनुच्छेद 58 में योग्यताएं निर्धारित की गई हैं।
- वह भारत का नागरिक हो
- वह 35 वर्ष से अधिक आयु का हो
- लोकसभा सदस्य बनने के योग्य
जो व्यक्ति भारत सरकार या किसी राज्य या किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण के तहत किसी पद पर पदासीन है वह राष्ट्रपति के चुनाव के लिए पात्र नहीं होगा। हालांकि, कुछ पदासीन व्यक्तियों को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में खड़े होने की अनुमति है:
- वर्तमान उप-राष्ट्रपति
- किसी भी राज्य का राज्यपाल
- प्रधानमंत्री
- किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री
यदि उपरोक्त व्यक्ति राष्ट्रपति चुनाव जीत जाते हैं उस स्थिति में इन्हें वर्तमान पद त्यागना होगा। राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है।
कर्तव्य
- राष्ट्रपति का प्राथमिक कर्तव्य भारत के संविधान और कानून का संरक्षण, सुरक्षा और बचाव करना है(अनुच्छेद 60)।
- राष्ट्रपति सभी स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं का प्रमुख होता है। भारत के कार्यकारी और विधायी संस्थाओं पर उनके सभी कार्यों और पर्यवेक्षी शक्तियों का उपयोग, संविधान को बनाए रखने के लिए किया जाएगा।
- राष्ट्रपति के कार्यों पर न्यायालय रोक नहीं लगा सकता।
- वैधानिक शक्ति विधायी शक्ति संवैधानिक रूप से भारत की संसद द्वारा निहित होती है, जिसमें राष्ट्रपति प्रमुख होता है(अनुच्छेद 78, अनुच्छेद 86)।
- वह लोकसभा को भंग कर सकता है।
- राष्ट्रपति आम चुनावों के पश्चात और प्रतिवर्ष पहले सत्र की शुरुआत में संसद का उद्घाटन करते हैं (अनुच्छेद 87 (1)। इन अवसरों पर राष्ट्रपति का संबोधन आम तौर पर सरकार की नई नीतियों की रूपरेखा तैयार करने के लिए होता है।
- संसद द्वारा पारित सभी विधेयक राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त करने के बाद ही कानून बन सकते हैं (अनुच्छेद 78)।
- राष्ट्रपति के समक्ष विधेयक पेश किए जाने के बाद, राष्ट्रपति विधेयक को स्वीकार कर सकता है, या वह संसद को पुनर्विचार के लिए विधेयक वापस कर सकता है (यदि यह धन विधेयक नहीं है)।
- राष्ट्रपति के अनुसार यदि संसद द्वारा पारित विधेयक संविधान का उल्लंघन कर रहा है, वह विधेयक को वापस भेज सकता है। पुनर्विचार के बाद, यदि बिल को संशोधन या बिना संशोधन पारित किया जाता है और राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है उस स्थिति में राष्ट्रपति अपनी सहमति वापस नहीं ले सकते।
- प्रधान मंत्री या मंत्रिपरिषद के परामर्श पर वीटो का प्रयोग करके, राष्ट्रपति विधेयक पर सहमति रोक सकते हैं (अनुच्छेद 74)।
- राष्ट्रपति किसी मुद्दे की संवैधानिक वैधता के बारे में सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श कर सकते है (अनुच्छेद 143)।
- किसी परिस्थिति में संसद के दोनों सदनों का सत्र नहीं है और सरकार को तत्काल प्रक्रिया की आवश्यकता महसूस होती है, उस दौरान राष्ट्रपति उन अध्यादेशों की घोषणा कर सकता है, जो संसद की विधायी शक्तियों के तहत पारित अधिनियम के समान बल और प्रभाव रखते हैं।
कार्यकारी शक्तियां
- संघ की समस्त कार्यपालिकीय शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है और राष्ट्रपति द्वारा या तो सीधे या अधिकारियों के माध्यम से उन्हें संविधान के अनुसार अधीनस्थ किया जाता है (अनुच्छेद 53)
- मंत्रिपरिषद या प्रधान मंत्री कानूनी रूप से राष्ट्रपति को दी गई सलाह के प्रति जवाबदेह नहीं होते, लेकिन यह राष्ट्रपति का दायित्व है कि वह अपने कर्तव्यों के पालन में संविधान का अनुपालन सुनिश्चित करे [अनुच्छेद 74(2)]
न्यायिक शक्तियाँ
- राष्ट्रपति का प्राथमिक कर्तव्य भारत के संविधान और कानून का संरक्षण, रक्षा और बचाव करना है (अनुच्छेद 60)
- राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
- भारत सरकार के मुख्य कानूनी सलाहकार, भारत के अटॉर्नी जनरल को भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है [अनुच्छेद 76(1)]
- राष्ट्रपति, अटॉर्नी जनरल को संसदीय कार्यवाही में भाग लेने के लिए कह सकते हैं (अनुच्छेद 88)
नियुक्ति शक्तियाँ
राष्ट्रपति द्वारा विभिन्न पदों पर की जाने वाली नियुक्तियाँ -
- प्रधानमंत्री
- राज्यसभा में 12 सदस्य
- लोकसभा में 02 एंग्लो-भारतीय नागरिक (2020 तक)
- राज्यों के राज्यपाल
- सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश
- उच्च न्यायालयों के न्यायधीश
- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री
- नियंत्रक और महालेखा परीक्षक
- मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त
- संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष
- अटॉर्नी जनरल
- अन्य देशों के राजदूत और उच्चायुक्त (प्रधानमंत्री की सलाह पर)
- अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी
- केंद्रीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
वित्तीय शक्तियाँ
- राष्ट्रपति की अनुशंसा के साथ ही संसद में धन विधेयक पेश किया जा सकता है।
- राष्ट्रपति अप्रत्याशित खर्चों को पूरा करने के लिए भारत के आकस्मिक निधि से अग्रिम ले सकते हैं।
राजनयिक शक्तियाँ
- सभी अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों पर बातचीत और समापन राष्ट्रपति की ओर से किया जाता है।
सैन्य शक्तियाँ
- राष्ट्रपति भारतीय सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर हैं।
- वह राष्ट्रपति प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर युद्ध/शांति की घोषणा कर सकता है।
क्षमा करने की शक्तियाँ
अनुच्छेद 72 में राष्ट्रपति को निम्नलिखित स्थितियों में क्षमा प्रदान करने का अधिकार दिया गया है:
- केंद्रीय कानून के खिलाफ अपराध के लिए सजा
- सैन्य न्यायालय द्वारा दी गई सजा
- मृत्युदंड की सजा
आपातकालीन शक्तियाँ
- राष्ट्रपति राष्ट्रीय, राज्य और वित्तीय आपात की घोषणा कर सकते हैं (अनुच्छेद 352, 356 और 360)
- युद्ध/सशस्त्र विद्रोह/बाहरी आक्रमण के कारणों से पूरे भारत में या उसके क्षेत्र का एक राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया जा सकता है। भारत में इस तरह के आपातकाल की घोषणा 1962 (भारत-चीन युद्ध), 1971 (भारत-पाकिस्तान युद्ध) और 1975-1977 (इंदिरा गांधी द्वारा घोषित) में की गई थी।
- राष्ट्रपति ऐसे आपातकाल की घोषणा प्रधान मंत्री के लिखित अनुरोध के आधार पर ही कर सकते हैं (अनुच्छेद 352)। इस तरह की घोषणा को संसद द्वारा एक महीने के भीतर कम से कम दो-तिहाई बहुमत से अनुमोदित किया जाना चाहिए। ऐसा आपातकाल छह महीने के लिए लगाया जा सकता है। इसे बार-बार संसदीय अनुमोदन द्वारा छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है जिसकी कोई अधिकतम अवधि नहीं है।
- संबंधित राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर किसी राज्य में शासन, संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं किया जा रहा है, उस स्थिति में राज्य में राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल अनुच्छेजा सकता है (अनुच्छेद 356)।
- जब राष्ट्र या उसके किसी भी क्षेत्र की वित्तीय स्थिरता या क्रेडिट को खतरा हो तब राष्ट्रपति वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं (अनुच्छेद 360)
(भारत में आपातकाल)
राष्ट्रपति का कार्यालय निम्नलिखित परिदृश्यों में रिक्त हो जाता है:
- कार्यकाल पूरा होने पर
- आकस्मिक मृत्यु होने पर
- पद का परित्याग करने पर
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हटाने पर
- महाभियोग द्वारा हटाने पर
राष्ट्रपति पद रिक्त होने पर सारा कार्यभार उपराष्ट्रपति द्वारा संभाला जाता है (अनुच्छेद 65)। यदि उपराष्ट्रपति पद भी रिक्त हो उस स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश राष्ट्रपति पद संभालते हैं।


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